विश्व भ्रातृत्व दिवस पर स्वामी विवेकानंद के शिकागो उद्बोधन की 133वीं वर्षगाँठ मनाई गई
रामकृष्ण मिशन आश्रम मोराबादी में विविध धर्मों की आध्यात्मिक चेतना का हुआ संगम; विश्वबंधुत्व, सर्वधर्मसमभाव और मानव-सेवा का संदेश गूँजा

राँची, 11 सितंबर। विश्व भ्रातृत्व दिवस के पावन अवसर पर रामकृष्ण मिशन आश्रम, मोराबादी, राँची में स्वामी विवेकानंद के 1893 के ऐतिहासिक शिकागो उद्बोधन की 133वीं वर्षगाँठ श्रद्धा, आध्यात्मिक गरिमा एवं राष्ट्रीय चेतना के वातावरण में मनाई गई। आश्रम द्वारा प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम विभिन्न धर्मों की उदार, समन्वयकारी एवं सार्वभौमिक आध्यात्मिक परंपराओं के सुंदर संगम का साक्षी बना।
कार्यक्रम का शुभारंभ आश्रम के संन्यासी श्रेष्ठों द्वारा समवेत वैदिक ऋचाओं के मधुर एवं गंभीर गायन से हुआ। वैदिक मंत्रों की पवित्र अनुगूँज ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक चेतना से भर दिया। इसके बाद स्वामी ईश्वरानंद जी ने “ऐ मालिक तेरे बंदे हम” की भावपूर्ण प्रस्तुति दी, जिसमें श्री दिलीप बनर्जी ने तबले पर संगत की।
रामकृष्ण विवेकानंद शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थान मोराबादी के छात्र शोभन शनिग्रही एवं छात्रा प्रीति कुमारी ने स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण पर ओजस्वी एवं विचारोत्तेजक वक्तव्य प्रस्तुत किया। दोनों ने स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक उद्बोधन की कालजयी प्रासंगिकता तथा उसमें निहित भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि और विश्वबंधुत्व के संदेश को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया।

भाषण की वर्षगाँठ मनाई जाए तो वह स्वामी विवेकानंद के भाषण की—स्वामी भवेशानंद
आश्रम के सचिव स्वामी भवेशानंद जी ने आगत अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि सामान्यतः महान व्यक्तित्वों की जन्म-जयंती मनाई जाती है, किंतु यदि किसी के भाषण की वर्षगाँठ मनाई जाती है तो वह स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो उद्बोधन की है। यह उस भाषण की कालजयी शक्ति और विश्वव्यापी प्रभाव का प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि आज भी लोग शिकागो के उस ऐतिहासिक स्थल को देखने जाते हैं, जहाँ स्वामी विवेकानंद ने अपने अमर उद्बोधन से विश्व का ध्यान भारत की आध्यात्मिक विरासत की ओर आकृष्ट किया था। उनके भाषण ने विश्व को यह संदेश दिया कि भारत के पास दुनिया को देने के लिए बहुत कुछ है।
स्वामी भवेशानंद जी ने कहा कि स्वामी विवेकानंद का आह्वान था—भारत जागो, विश्व को जगाओ। उन्होंने भारतीयों में आत्मविश्वास जगाया और भारत की आध्यात्मिक शक्ति तथा सांस्कृतिक गौरव का पुनर्जागरण किया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में स्वामी विवेकानंद का अवदान अतुलनीय है। उन्होंने भारत की आत्मा को जगाया, राष्ट्रीय आत्मविश्वास का संचार किया और भारत के विश्वगुरु बनने का मार्ग प्रशस्त किया।

“सभी धर्म सत्य हैं”—स्वामी अंतरानंद
हिंदू धर्म के प्रतिनिधि एवं आश्रम के सह-सचिव स्वामी अंतरानंद जी ने कहा कि 11 सितंबर भ्रातृत्व एवं प्रेम का प्रतीक है। ऋग्वेद के प्रसिद्ध वाक्य “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सत्य एक है, ज्ञानीजन उसे अनेक नामों से अभिव्यक्त करते हैं। ब्रह्म अनंत है और सभी धर्मों का अंतिम गंतव्य एक ही है।
उन्होंने कहा कि सभी धर्म सत्य हैं। स्वामी विवेकानंद ने इसी उदार एवं सार्वभौमिक हिंदू धर्म को विश्व के पटल पर प्रतिष्ठित किया। धर्म विवाद का विषय नहीं, बल्कि अनुभव का विषय है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि धर्म अनुभव का नाम है।
स्वामी अंतरानंद जी ने कहा कि विश्वबंधुत्व, सर्वधर्मग्राह्यता, उदारता और सर्वधर्म-सहिष्णुता हिंदू धर्म की मूल चेतना है। मनुष्य का शरीर पंचमहाभूतों से निर्मित है और समस्त मानवता एक ही विराट अस्तित्व की अभिव्यक्ति है।

अविद्या का अंत ही वास्तविक भ्रातृत्व का आधार—भिक्खु डॉ. राहुल रत्न
बौद्ध धर्म के प्रतिनिधि भिक्खु डॉ. राहुल रत्न ने भगवान बुद्ध के जीवन एवं उनके करुणा, मैत्री, मुदिता और प्रेम के संदेश की चर्चा की। उन्होंने कहा कि जन्म से जुड़ी अविद्या के कारण मनुष्य के भीतर लोभ, क्रोध, द्वेष और मोह जैसी वृत्तियाँ बनी रहती हैं। यही विकार मनुष्य को मनुष्य से दूर करते हैं और समाज में भाईचारे के अभाव का कारण बनते हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध ने इन आंतरिक विकारों से मुक्ति का मार्ग दिखाया। अविद्या का अंत ही विश्वबंधुत्व की वास्तविक आधारभूमि है। उन्होंने भगवान बुद्ध और अंगुलिमाल की प्रेरणादायक कथा के माध्यम से बताया कि करुणा एवं आध्यात्मिक प्रकाश के स्पर्श से हिंसक से हिंसक व्यक्ति के जीवन में भी परिवर्तन संभव है।

गुरु नानक देव और स्वामी विवेकानंद का संदेश मानव-सेवा—प्रो. हरविंदर सिंह
सिख धर्म के प्रतिनिधि प्रोफेसर हरविंदर सिंह, राँची ने कहा कि आज का दिन विश्व इतिहास में एक युगांतरकारी एवं क्रांतिकारी दिन है। उन्होंने गुरु नानक देव जी के जीवन एवं संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि सिख धर्म की मूल चेतना में मानव-मानव के बीच समानता, प्रेम, श्रम, सत्य और सेवा का भाव निहित है।
उन्होंने नारी के सम्मान, सत्य एवं ईमानदारी से अर्जित धन तथा अपनी कमाई को मानव-सेवा में लगाने की प्रेरणा का उल्लेख किया। “सच्चा सौदा” की कथा के माध्यम से उन्होंने सेवा को जीवन का सर्वोच्च मूल्य बताया। उन्होंने कहा कि गुरु नानक देव जी का संदेश था—सच्चाई से कमाओ, बाँटकर खाओ और मानवता की सेवा करो।
प्रो. हरविंदर सिंह ने कहा कि गुरु ग्रंथ साहिब में विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं और महापुरुषों के प्रति सम्मान की व्यापक दृष्टि दिखाई देती है। गुरु नानक देव जी और स्वामी विवेकानंद—दोनों ने मानवता की सेवा को जीवन का महान उद्देश्य बताया।

“जितने मत उतने पथ” का सार्वभौमिक संदेश
राजगीर रामकृष्ण आश्रम से पधारे स्वामी रामतत्त्वानंद जी ने श्रीरामकृष्ण देव के जीवन एवं साधना पर प्रभावपूर्ण प्रवचन प्रस्तुत किया।
उन्होंने श्रीरामकृष्ण देव के महान संदेश “जितने मत उतने पथ” की व्याख्या करते हुए कहा कि ईश्वर तक पहुँचने के अनेक मार्ग हो सकते हैं, लेकिन गंतव्य एक ही है। श्रीरामकृष्ण देव ने विभिन्न धर्म-पंथों की साधना स्वयं करके यह प्रमाणित किया कि हिंदू, इस्लाम, ईसाई तथा अन्य आध्यात्मिक परंपराएँ अपने-अपने मार्गों से उसी परम सत्य की ओर अग्रसर होती हैं।
उन्होंने कहा कि श्रीरामकृष्ण देव ने प्रत्येक जीव में शिव के दर्शन करने की शिक्षा दी। मनुष्य के भीतर ही ईश्वर का निवास है। इसलिए जीव पर दया नहीं, बल्कि “शिव ज्ञान से जीव सेवा” का भाव होना चाहिए। स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु के इस महान संदेश को ग्रहण कर उसे विश्वव्यापी स्वर प्रदान किया।

भक्ति-संगीत से भावविभोर हुआ वातावरण
इसके बाद सुश्री स्वप्न मिस्त्री एवं उनके समूह द्वारा प्रस्तुत हृदयग्राही समूहगान ने वातावरण को भक्ति एवं आध्यात्मिक अनुभूति से भर दिया। “भवसागर तारण कारण हे…” गुरु प्रार्थना की भावपूर्ण प्रस्तुति ने उपस्थित जनों को गहन सात्त्विक अनुभूति से अभिभूत कर दिया।
“आजाद” नाटक ने छोड़ी अमिट छाप
कार्यक्रम के अंत में रामकृष्ण विवेकानंद शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थान, मोराबादी के विद्यार्थियों द्वारा “आजाद” शीर्षक नाटक का प्रभावशाली मंचन किया गया। नाटक ने राष्ट्रीय चेतना, स्वतंत्रता, आत्मसम्मान एवं युवा शक्ति के प्रश्नों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हुए दर्शकों एवं श्रोताओं पर गहरी छाप छोड़ी।
कार्यक्रम का मंच संचालन सुश्री समृद्धि एवं श्री प्रणय प्रत्यूष ने अत्यंत सुंदर एवं प्रभावशाली ढंग से किया। कार्यक्रम के संयोजक स्वामी सुखमयानंद जी एवं श्री सुप्रतिम पात्रा रहे। धन्यवाद ज्ञापन प्रोफेसर संदीप कुमार पॉल, सह-अधिष्ठाता, रामकृष्ण विवेकानंद शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थान, मोराबादी, राँची ने किया।
इस अवसर पर आश्रम के संन्यासीगण स्वामी देवतात्मानंद जी, स्वामी लोकपालानंद जी, स्वामी इष्टकामानंद जी, स्वामी प्रभुनामानंद जी, स्वामी अनुकम्पानंद जी महाराज सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति, शिक्षक, विद्यार्थी एवं श्रद्धालु उपस्थित थे।
विश्व भ्रातृत्व दिवस का यह आयोजन केवल स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो उद्बोधन की स्मृति का पुनर्स्मरण नहीं, बल्कि उसके शाश्वत संदेश की पुनर्प्रतिष्ठा भी था—धर्म मनुष्य को बाँटने के लिए नहीं, जोड़ने के लिए है; विविधता संघर्ष का कारण नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की सुंदरता है; और समस्त मानवता एक ही विराट चेतना की अभिव्यक्ति है।
स्वामी विवेकानंद के 133 वर्ष पुराने शिकागो संदेश की प्रासंगिकता आज भी अक्षुण्ण है—प्रेम हो, भ्रातृत्व हो, सभी धर्मों के प्रति सम्मान हो और मानव-सेवा के माध्यम से विश्व में एकात्मता की स्थापना हो।