राँची, 10 मई 2026: रामकृष्ण मिशन आश्रम, मोराबादी, राँची के वार्षिकोत्सव के दूसरे दिन आज प्रथम सत्र का शुभारंभ सुबह 9:30 बजे विवेकानंद फोरम, सारदा महिला समिति, गैप (GAP) एवं योग छात्र समूह द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ हुआ। झारखंड सरकार के कला एवं संस्कृति निदेशालय द्वारा सह-प्रायोजित इस कार्यक्रम में बच्चों की प्रतिभा और सेवा भाव का अद्भुत संगम दिखा।
प्रथम सत्र: बाल प्रतिभा और सेवा संकल्प कार्यक्रम के दौरान विवेकानंद फोरम के श्री प्रशांत दास ने स्वामी विवेकानंद जी की ‘अल्मोड़ा यात्रा’ की प्रेरक घटना का उल्लेख किया। गदाधर प्रकल्प, चिरौंधी के बच्चों ने बाल शिक्षा पर आधारित एक मार्मिक नाटक प्रस्तुत किया। गदाधर अभ्युदय प्रकल्प के बच्चों ने कविता पाठ, ‘हिंद देश के निवासी’ गान और हनुमान चालीसा के पाठ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर अखंडानंद शिक्षा एवं संस्कार केंद्र, गदाधर अभ्युदय प्रकल्प और सारदा अभ्युदय प्रकल्प के मेधावी बच्चों को पुरस्कार वितरित किए गए।
खेतड़ी (राजस्थान) से आए स्वामी आत्मनिष्ठानंद जी महाराज ने अपने संबोधन में कहा, “बदलाव की शक्ति युवाओं में है। स्वामी जी के आदर्श को केवल पढ़ना नहीं वरन् उसे जीवन में उतारना है।“ उन्होंने बताया कि कैसे खेतड़ी के राजा ने स्वामी जी की अमेरिका यात्रा में सहयोग दिया था। उन्होंने स्वामी अखंडानंद जी (स्वामी जी के गुरुभाई) का उदाहरण देते हुए कहा कि गरीबों की सेवा ही सच्ची पूजा है। स्वामी विवेकानंद जी ने मार्गदर्शन दिया था – “दरिद्र देवो भव, मूर्ख देवो भव, तुम गरीबों की सेवा करने से ईश्वर के नजदीक आ जाओगे।“ महाराज जी ने राँची के आसपास के सेवा कार्यों की जमकर प्रशंसा की।
धर्म सभा: श्री सारदा देवी – कलियुग की सीता शाम 4:30 बजे धर्म सभा का आयोजन हुआ, जिसकी अध्यक्षता स्वामी आत्मनिष्ठानंद जी ने की। मंच पर आश्रम के सचिव स्वामी भवेशानंद जी, प्रबंधकर्त्री समिति के अध्यक्ष श्री बिनोद कुमार गाद्यायन और मुख्य अतिथि जमशेदपुर की प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. निधि श्रीवास्तव उपस्थित थीं। वैदिक मंत्रोच्चार के बाद स्वामी इष्टकामानंद जी ने ‘माँ आछेन आर आमि आछी’ और ‘ओ मदर सारदा’ गीतों की प्रस्तुति दी, जिस पर श्री रेणुशंकर मिश्र ने तबले पर संगत की।
- स्वामी भवेशानंद जी ने ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ श्लोक से श्री माँ और रामकृष्ण देव के आविर्भाव को समझाया। उन्होंने माँ के उपदेश को साझा किया कि “स श ष (सहन करना) सबसे बड़ी वस्तु है“ और ठाकुर ने सिखाया था कि “जैसे चंदा मामा सबके मामा होते हैं, वैसे ही भगवान सबके भगवान होते हैं।“
- डॉ. निधि श्रीवास्तव ने कहा कि माँ सारदा, सीता जी की तरह ही ‘भूमि पुत्री’ और लज्जाशीला थीं। उन्होंने कहा, “श्री राम आए थे धनुषवाण के साथ, श्री रामकृष्ण आए करुणा लेकर। एक बार दिल से पुकार लो ‘माँ है न‘, फिर किसी बात की चिंता नहीं।“ उन्होंने विवेकानंद को माँ का ‘हनुमान’ बताया।
- स्वामी आत्मनिष्ठानंद जी ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कई रोचक प्रसंग सुनाए। उन्होंने बताया कि स्वामी जी भारतमाता को सीता का मूर्तमान स्वरूप मानते थे। उन्होंने कहा— “जो राम जो कृष्ण वही अब रामकृष्ण।“ उन्होंने उल्लेख किया कि पंचवटी में ठाकुर ने माँ सीता को देखा था और माँ सारदा के लिए वैसे ही कंगन बनवाए थे। उन्होंने उस घटना का भी जिक्र किया जब सेठ लक्ष्मी नारायण के 10,000 रुपये के प्रस्ताव को माँ ने यह कहकर ठुकरा दिया कि “मेरा स्वीकार करना श्री रामकृष्ण देव का ही स्वीकार करना होगा।“ उन्होंने माँ का वह मर्मस्पर्शी संदेश भी दोहराया जो उन्होंने एक महिला भक्त से कहा था— “शांति चाहते हो तो अपना दोष देखो। संसार में सब अपना है, कोई पराया नहीं।“स्वामी जी ने यह भी बताया कि कैसे बचपन में ही माँ ने सीता स्वयंवर की तरह अपने भावी पति को इंगित किया था और विश्व विजय के बाद विवेकानंद ने माँ के चरणों में साष्टांग प्रणाम कर कहा था— “माँ, आपकी कृपा से ही यह कर सका।“
समापन और आगामी योजनाएँ: प्रबंधकर्त्री समिति के सदस्य श्री प्रशांत देव जी ने भक्तों को निर्माणाधीन ‘दिव्य मंदिर‘ के प्रगति की जानकारी दी। अंत में सुरेंद्रनाथ पब्लिक स्कूल एवं वि.वि.पी.एस. की छात्राओं ने ‘नव वेदांत का अग्रदूत’ नाटक और ‘सबकी माँ सारदा’ भजन प्रस्तुत किया। अध्यक्ष श्री वी. के. गाद्यायन ने स्वामी आत्मनिष्ठानंद जी सहित सभी अतिथियों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।









